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फिल्म रिव्यू – ‘दे दे प्यार दे 2’:हल्की-फुल्की फैमिली कॉमेडी, आर. माधवन–अजय देवगन की मजेदार टक्कर, जानें क्यों फिल्म है देखने लायक

6 months ago

काफी समय बाद हिंदी सिनेमा में एक ऐसी रोमांटिक कॉमेडी आई है, जो पूरी तरह परफेक्ट नहीं है, लेकिन मनोरंजन जरूर करती है। फिल्म दे दे प्यार दे 2 एक तरफ हल्की-फुल्की फैमिली कॉमेडी है, तो दूसरी तरफ रिश्तों, उम्र के फासले और आधुनिकता की सीमाओं पर कटाक्ष भी करती है। फिल्म कई जगह डगमगाती है, लेकिन दर्शकों को जोड़े रखने में सफल रहती है। फिल्म की कहानी फिल्म पहले भाग के बाद वहीं से शुरू होती है। आयशा (रकुल प्रीत सिंह) अपने परिवार को आशीष (अजय देवगन) से मिलवाना चाहती है। खुद को आधुनिक और खुले विचारों वाला बताने वाला परिवार, जब अपनी बेटी के प्रेमी की उम्र पता लगाता है, तो यही लोग अलग-अलग तरह के हथकंडे अपनाते हैं, जिससे असली ड्रामा शुरू होता है। पहला हिस्सा बेहद मजेदार, हल्का-फुल्का और लगातार हंसी वाला है। आयशा के माता-पिता का बदला हुआ रवैया, मीजान का एंट्री लेना और अजय–माधवन के बीच टकराव फिल्म को गति देते हैं। दूसरे हिस्से में कहानी थोड़ी धीमी हो जाती है। कई सीन जरूरत से ज्यादा लंब जाते हैं, जिससे ड्रामा भारी लगता है। हालांकि आखिरी 20–30 मिनट का ट्विस्ट फिर से दर्शकों को कहानी में खींच लाता है और फिल्म मनोरंजन वाले गियर में लौट आती है। फिल्म में अभिनय अजय देवगन अपने शांत, सहज कॉमेडी और इमोशनल पलों के साथ प्रभावित करते हैं। आर. माधवन फिल्म के सबसे मजबूत कलाकार साबित होते हैं। गुस्सा, कॉमेडी और संवेदनशीलता तीनों को बेहतरीन ढंग से निभाते हैं। रकुल प्रीत सिंह हल्के सीनों में शानदार हैं, लेकिन इमोशनल सीन्स में कुछ जगह लाउड लगती हैं। जावेद जाफरी अपनी कॉमिक टाइमिंग और वन-लाइनर्स से लगातार हंसाते हैं। मीजान की फिल्म में एक्टिंग दर्शकों के लिए सरप्राइज हैं। उनकी ऊर्जा, स्क्रीन प्रेजेंस और डांस तीनों में प्रभावित करते हैं। गौतमी कपूर और इशिता दत्ता अपने किरदारों में सादगी और गरमाहट भर देती हैं। फिल्म का निर्देशन और तकनीकी पक्ष अंशुल शर्मा ने फिल्म का टोन हल्का, रंगीन और रफ्तार वाला रखने की कोशिश की है। पहला हिस्सा मजबूत और पकड़ने वाला है। दूसरा हिस्सा कई जगह खिंचता है। कुछ इमोशनल सीन्स असरदार हैं, कुछ बनावटी महसूस होते हैं। परिवार की प्रगतिशील लेकिन असल में रूढ़िवादी सोच पर अच्छे कटाक्ष हैं। फिल्म का संगीत ‘तीन शौक’ और ‘झूम बराबर’ पहले ही पॉपुलर हैं और स्क्रीन पर भी अच्छा असर छोड़ते हैं, लेकिन फिल्म में पहले पार्ट जैसा कोई रोमांटिक गाना नहीं है, जो दर्शकों को याद रह जाए। फिल्म क्यों देखें? अगर आप पारिवारिक कॉमेडी, हल्का-फुल्का ड्रामा, रिश्तों की मनमुटाव वाली कहानियां और अजय–माधवन के बीच के मजेदार टकराव को देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म एक अच्छा वीकेंड विकल्प है। फिल्म कमियां लेकर आती है, लेकिन मनोरंजन भी पूरा देती है। न बहुत बड़ी, न बहुत छोटी... बस देखने लायक।
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