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कपड़े उधार लेकर ऑडिशन देती थीं:पहली फिल्म से 3000 रुपए मिले, रसिका दुग्गल बोलीं- दिल्ली क्राइम और मिर्जापुर ने ब्लॉकबस्टर जैसा अनुभव दिया

11 months ago

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रसिका दुग्गल बॉलीवुड की उन अभिनेत्रियों में से हैं, जिन्होंने अपनी बेहतरीन एक्टिंग से दर्शकों का दिल जीता है। छोटे शहर जमशेदपुर से बड़े पर्दे तक उनका सफर मेहनत, लगन और हिम्मत की कहानी है। ‘मिर्जापुर’, ‘मंटो’ और ‘दिल्ली क्राइम’ जैसे प्रोजेक्ट्स में उनके दमदार किरदारों ने उन्हें अलग पहचान दी। हालांकि करियर के शुरुआती दौर में उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। कई प्रोड्यूसर्स ने कहा कि वे “सेलेबल” नहीं हैं, यहां तक कि एक डायरेक्टर ने उनसे असम्मानजनक व्यवहार भी किया था। लेकिन रसिका ने ऐसे लोगों से हमेशा दूरी बनाए रखी और अपने काम पर ध्यान दिया। किराया भरने की चिंता और बार-बार रिजेक्शन झेलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। रसिका का मानना है कि सफलता का मतलब शोहरत नहीं, बल्कि हर दिन खुद को नए रूप में गढ़ने का साहस है। आज की सक्सेस स्टोरी में जानिए रसिका दुग्गल के करियर और निजी जीवन की कुछ अनकही और खास बातें, उन्हीं की जुबानी… भागदौड़ भरी जीवनशैली से बहुत दूर थी मैंने अपनी शुरुआती पढ़ाई जमशेदपुर के सेक्रेड हार्ट कॉन्वेंट स्कूल से की। इसके बाद दिल्ली के लेडी श्री राम कॉलेज से गणित में ऑनर्स किया, फिर मुंबई के सोफिया कॉलेज से सोशल कम्युनिकेशन मीडिया में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया और आखिर में पुणे के एफटीआईआई से अभिनय में डिप्लोमा लिया। अब इंडस्ट्री में लगभग 20 साल हो गए हैं। मेरा बचपन जमशेदपुर जैसे छोटे शहर में बीता, जहां सब कुछ वॉकिंग डिस्टेंस पर था और ट्रैफिक की टेंशन नहीं थी। मुंबई आकर समय देखकर ही निकलना पड़ता है, ये एक अलग ही अनुभव था। मेरा बचपन बहुत साधारण था, कोई बड़ा सपना या पागलपन नहीं था, बस घर, स्कूल और दोस्तों के साथ समय बिताना था। कहते हैं सफलता के लिए रंगीन बचपन जरूरी होता है, लेकिन मेरा नॉर्मल बचपन था और मैं उस रैट रेस से कोसों दूर थी (भागदौड़ भरी जीवनशैली से बहुत दूर थी), जहां कुछ हासिल करने का पागलपन रहता है। एक्टिंग के बारे में कभी नहीं सोचा था मैंने ऐसे कभी नहीं सोचा था कि एक्टर ही बनना है, लेकिन जिसमें भी मुझे मौका मिलता, मैं वो बड़े मजे से करती थी। एक्टिंग को मैं आगे चलकर करियर बनाऊंगी, ये कभी नहीं सोचा था। न फैमिली में कोई ऐसा उदाहरण था सब बिजनेस लाइन से थे। कुछ लोग होते हैं ना, जो बचपन से एक्टर बनने का सपना देखते हैं और बाथरूम में शैंपू की बोतल पकड़कर अपनी विनिंग स्पीच दे रहे होते हैं, वैसा नहीं था मेरे साथ। जब मैं दिल्ली में एलएसआर कॉलेज में ड्रामैटिक सोसाइटी का हिस्सा थी, तो स्टेज पर परफॉर्म करना मुझे अच्छा लगता था, पर उसमें करियर बनाने का नहीं सोचा था। 26 साल बाद एफटीआईआई में एक्टिंग कोर्स फिर से शुरू हो रहा था सोफिया कॉलेज से पढ़ने के बाद मैंने एकेडमिक रिसर्च प्रोजेक्ट्स पर काम करना शुरू किया था, लेकिन मैं जानती थी कि इस फील्ड में आगे बढ़ना है तो मुझे सोशल साइंस में हायर एजुकेशन लेनी पड़ेगी और तब लगा कि शायद ये मेरे लिए नहीं बना है। जब आप यंग लाइफ में बहुत कुछ कर चुके होते हो न, तब जब आपको सही चीज मिलती है तो अंदर से एक फीलिंग आती है कि ‘यार, ये बाकियों से अलग है’ और एक्टिंग में मुझे ऐसा ही फील हुआ। फिर लखनऊ से मुझे एक रिसर्च असिस्टेंट की जॉब का ऑफर आया और मैं चली गई। वहां का प्रोजेक्ट खत्म हुआ तो एक और मेल आया कि मुंबई में ‘पुकार’ नामक ऑर्गनाइजेशन जेंडर एंड पब्लिक स्पेस पर रिसर्च कर रहा है और उन्हें असिस्टेंट चाहिए। तो मैं वहां चली गई। एक दिन मैंने अखबार में पढ़ा कि एफटीआईआई 26 साल बाद अपना एक्टिंग कोर्स फिर से शुरू कर रहा है, तो मैंने भी अप्लाई करने का सोचा। 500 एप्लिकेंट्स थे और 20 सीटें ही थीं मैंने एफटीआईआई के बारे में अपने दोस्तों से बहुत कुछ सुन रखा था कि वहां के कैंपस में लोग सिनेमा को ब्रीद करते हैं, वहां के ‘विजडम ट्री’ के नीचे बैठते ही आइडियाज आते हैं, कैंपस में बड़े-बड़े फिल्ममेकर्स की रूह आज भी घूमती है। दिलचस्पी हुई, तो मैंने अप्लाई किया। करीब 500 एप्लिकेंट्स थे और 20 सीटें ही थीं। 4 राउंड का एग्जाम था और आखिरी राउंड में हमारा वर्कशॉप था। उस वर्कशॉप में ऐसे लोग थे जो 14 साल से थिएटर से जुड़े थे और मैं एलएसआर में तीन नाटक करके आई थी! मुझे पक्का यकीन था कि नहीं होगा, बस एक्सपीरियंस लेकर लौट जाऊंगी, लेकिन लकीली मेरा सिलेक्शन हो गया, क्योंकि वे अपने सिलेक्शन में डायवर्सिटी ढूंढ रहे थे। मैंने वर्क-वाइज भी अलग-अलग तरह की चीजें की थीं, एक्टिंग के अलावा भी। और मुझे लगता है कि डायवर्सिटी बहुत जरूरी है एक एक्टर की लाइफ में। टॉप उधार मांगा, मेकअप किया और ऑडिशन देने पहुंच गई मेरी फ्रेंड फिल्म अनवर में एडी थी, तो वो एक फिल्म के छोटे से रोल के लिए ऑडिशन ले रही थी। मुझे पता चला तो मैंने पूछा कि मैं भी साथ चलूं क्या, क्योंकि एफटीआईआई से निकलने के बाद मुझे लगा था कि ऐसे अनुभव जरूरी हैं। मैंने किसी लड़की का टॉप उधार मांगा, मेकअप किया और पहुंच गई ऑडिशन देने। डायरेक्टर को मैं पसंद आ गई और बाई चांस मुझे वो फिल्म मिल गई। फिर एक महीने बाद एफटीआईआई का कोर्स पूरा होने वाला था, तो लगा कि अब सफर आसान होगा, बढ़िया अवसर मिलेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रिजेक्शन हमारे बीच जोक बन गया था मैं मुंबई शिफ्ट हुई। वहां ओशिवरा में ‘श्रीजी’ नाम की जगह के ऊपर स्टूडियो बने हुए थे जहां विज्ञापन फिल्मों की शूटिंग होती थी। तब ऐड मतलब आज के इन्फ्लुएंसर जैसा था पैसे भी ठीक मिलते थे और विजिबिलिटी भी। हम रोज मेकअप लगाकर धूप में बैठकर ऑडिशन देते, फिर दो घंटे बाद रिजल्ट आता कि ‘रिजेक्ट’। मैं चार लड़कियों के साथ रहती थी एक राइटर, एक डायरेक्टर। हम सब रोज सुबह काम की तलाश में निकलते और शाम को रिजेक्ट होकर लौटकर अपनी कहानियां शेयर करते। इतना रिजेक्शन देखा कि हमारे बीच एक जोक बन गया था कि जिस दिन सिलेक्शन का कॉल आएगा, हम कहेंगे कि “हम नहीं आ सकते, हमें ऑडिशन देने जाना है!” हमेशा टेंशन रहती थी कि रेंट कैसे भरेंगे मुंबई में मैं एक फ्लैट में चार लड़कियों के साथ रहती थी, लेकिन इसके अलावा भी कई लोग इलीगल तरीके से रहते थे। सुबह उठती तो हॉल में 4-5 लोग सोए मिलते थे। जिनके पास अपना घर नहीं होता, वो एफटीआईआई वाले आकर हमारे साथ रहते थे। मेरा दिन शुरू होता था मेकअप करके ऑडिशन के लिए जाने की सोच से, क्योंकि मेरा मोटिवेशन यही था कि रेंट टाइम पर देना है। जब से मैंने घर छोड़ा, कभी भी पैसे घर वालों से नहीं मांगे, लेकिन ये तो लगता था कि जरूरत पड़ने पर मदद मिल जाएगी। एक बार मैं थिएटर में काम कर रही थी, नाटक में मैं जूलियट बनी थी और आर्य बब्बर रोमियो। थिएटर की आमदनी बहुत कम थी। तभी एक लड़का आया और बताया कि श्री जी के 98 नंबर के स्टूडियो में ऐड के लिए ऑडिशन चल रहे हैं। मैंने पूछा कि नाटक की रिहर्सल शुरू होने में कितना समय है, बोला 20 मिनट। मैं भागी और ऑडिशन दिया, फिर वापस आकर नाटक में परफॉर्म किया। रेंट भरना ही मेरी सबसे बड़ी वजह थी तब। पहली फिल्म के लिए 3000 रुपए मिले थे अनवर के बाद मुझे अनुराग कश्यप की फिल्म ‘नो स्मोकिंग’ मिली थी। जब मेरा सिलेक्शन हुआ, तो प्रोड्यूसर ने बुलाया और कहा कि आकर पैसों पर बात कर लो। मैं गई, तो उन्होंने पूछा, “कितने पैसे लोगी?” मैंने थोड़ी हिम्मत करके कहा कि प्रतिदिन 7500 रुपए। वो बोले, “अरे, ये तो बहुत ज्यादा है, थोड़ा कम करो।” घर आकर मैंने अपने दोस्त दीपक डोबरियाल को बताया, तो वो हंसने लगा और बोला, “तूने इतना मांग भी लिया!” फिर बात तय हुई और मुझे प्रतिदिन 5000 रुपए मिले। जबकि पहली फिल्म ‘अनवर’ के लिए तो सिर्फ 3000 रुपए प्रतिदिन मिले थे। डायरेक्टर ने कहा- खड़ी हो जाओ, मुझे देखना है मुझे रैंडम मीटिंग्स में जाने से डर लगता था, क्योंकि पहले से ही इंडस्ट्री के कास्टिंग काउच वगैरह के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था । अगर किसी से काम मांगने जा रहे हैं, तो बैकग्राउंड भी चेक करना पड़ता है ताकि काम भी न छूटे, बहुत मुश्किल सिचुएशन होती थी। एक बार एक डायरेक्टर ने मुझे फिल्म की कहानी सुनाने के लिए मैरियट होटल के कॉफी शॉप में बुलाया। बातचीत के दौरान उसने कहा, “एक बार खड़ी हो जाओ, मुझे देखना है।” मैंने कहा, “आपको क्या देखना है? सॉरी, मैं नहीं कर सकती।” इतना भी कोई डेस्परेशन नहीं है काम का, मैं ऐसे घटिया लोगों के साथ कोई फिल्म नहीं करना चाहूंगी। खुद को रीइन्वेंट करते रहना चाहिए मेरे लिए सफलता का मतलब सिर्फ नाम या शोहरत नहीं है। मुझे तब लगता है कि कुछ हासिल किया है जब मैं अपना काम दिल से कर पाऊं और वो मुझे सच्ची खुशी दे। अगर हर दिन कुछ नया सीखने को मिले, कुछ नया खोजने को मिले, तो वही मेरे लिए सक्सेस है। मुझे लगता है कि इंसान को बार-बार खुद को रीइन्वेंट करते रहना चाहिए, क्योंकि वहीं से आगे बढ़ने की असली प्रेरणा मिलती है। और ऐसा तभी हो सकता है जब आप रिस्क लेने की हिम्मत रखें, डरने के बजाय नए अनुभवों को अपनाने की कोशिश करें। इंटीमेट सीन कहानी की जरूरत थी, सेंसशनलाइज नहीं किया गया रसिका दुग्गल ने अपने एक्टिंग करियर में कई फिल्मों और वेब सीरीज में दमदार भूमिका निभाई है। खास करके वेब सीरीज 'मिर्जापुर' में बीना त्रिपाठी की भूमिका ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। इस सीरीज में उनके इंटीमेट सीन की भी खूब चर्चा हुई। उस सीन के बारे में रसिका कहती हैं- वो सीन स्क्रिप्ट के पॉइंट ऑफ व्यू से जरूरी था। उसे जबरदस्ती या सेंसशनलाइज करने के लिए नहीं डाला गया था। पुनित कृष्ण जो राइटर हैं, उन्होंने हर किरदार को बहुत सेंसिटिवली बिल्ड किया था। रही बात इंटिमेट सीन की तो पुनित, गुरमीत और करण ने शूट से पहले मुझे हर शॉट के बारे में बताया। सेट पर कौन मौजूद होगा, क्लोज सेट रहेगा, ये सारी बातें पहले ही डिस्कस हो गई थीं, जो मेरे कंफर्ट के लिए जरूरी थीं। अब तो इंटीमेसी कोऑर्डिनेटर आ गए हैं, लेकिन तब नहीं थे। दिल्ली क्राइम और मिर्जापुर ने ब्लॉकबस्टर सी फील दी मेरे करियर का टर्निंग पॉइंट नंदिता दास की फिल्म मंटो से आया। उससे पहले इरफान खान और तिलोत्तमा के साथ 'किस्सा' जैसी खास फिल्में कीं, पर मंटो ने नया रास्ता दिखाया। उस समय कई डायरेक्टर्स मुझे प्रोजेक्ट में लेना चाहते थे, लेकिन प्रोड्यूसर्स ने कहा- मैं सेलेबल नहीं हूं। फिर नंदिता ने मुझमें भरोसा जताया और मंटो में सफिया मंटो का रोल दिया। यही निर्णायक मोड़ रहा। उसके बाद दिल्ली क्राइम और मिर्जापुर जैसे शो आए, जिसने बड़े ऑडियंस के सामने मेरी पहचान बनाई और ब्लॉकबस्टर सी फील दी। —----------------- पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी पढ़िए... शेखर कपूर-फिरोज नाडियाडवाला करने वाले थे लॉन्च:एक्सीडेंट ने बदली किस्मत, प्रियदर्शन ने दिया मौका, मुकेश ऋषि बोले- हर स्टार का विलेन रहा हूं फिल्मों में अपने खलनायक किरदारों से घर-घर पहचान बनाने वाले मुकेश 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