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Gopashtami 2025: गौसेवा और श्रीकृष्ण की भक्ति का दिव्य संगम, जाने पूर्ण कथा और पूजा विधि!

8 months ago

Gopashtami 2025: हिंदू संस्कृति में गाय को सिर्फ एक पशु नहीं, बल्कि माता के रूप में पूजनीय माना गया है. हमारे वेद, पुराण और लोककथाएं गाय की महिमा में लीन हैं. गायों में सभी देवताओं का वास होता है, इसलिए इसे गोमाता कहा जाता है.

इन सभी भावनाओं का सजीव प्रतीक गोपाष्टमी है. जिसे कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है. यह दिन करुणा, सेवा और भक्ति का पवित्र प्रतीक माना जाता है.

कब है गोपाष्टमी?

हिन्दू पंचांग के अनुसार इस साल कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 29 अक्टूबर 2025, बुधवार को सुबह 09 बजकर 23 मिनट पर शुरू होगी, जिसका समापन 30 अक्टूबर, गुरुवार के दिन सुबह 10 बजकर 06 मिनट पर होगा.

इसलिए इस साल गोपाष्टमी का पावन पर्व 30 अक्टूबर 2025, गुरुवार के दिन ही मनाना उचित रहेगा.

गोपाष्टमी पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व

लोक कथाओं और पुराणों के अनुसार,  गोपाष्टमी का दिन भगवान श्रीकृष्ण के जीवन का एक विशेष अध्याय है. इस दिन से भगवान में गायों को चराने का आरंभ किया था. इससे पहले वे केवल बछड़ों को ही चराते थे.

कृष्ण जब 8 वर्ष के हुए तब उन्होंने नंद बाबा से पूछा की अब मैं बड़ा हो गया हूं, मैं अब बछड़ों को नहीं गायों को चराने जाऊंगा. तब कृष्ण के आग्रह करने पर उन्होंने पंडित जी को बुलाया, तब उन्होंने पंचांग के अनुसार बताया कि गायों को चराने का शुभ मुहूर्त आज ही है, इसके अलावा पूरे साल कोई भी शुभ मुहूर्त नहीं हैं.

यह सुनते ही कृष्ण गोपों के साथ वन की ओर निकल पड़े. 

इस दिन के बाद से उन्होंने संपूर्ण गौधन की सेवा का दायित्व संभाला. तभी से यह दिन गौसेवा और गोपालन की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. श्रीकृष्ण ने कहा है कि गाय मेरी आत्मा हैं, इसलिए गोपाष्टमी को गोपालक और गौभक्तों के लिए इसे विशेष पर्व के रूप में मनाया जाता है.

ब्रज क्षेत्र में इस दिन विशेष उत्सव का आयोजन किया जाता है, जहाँ गोधन की पूजा और आराधना की जाती है.

गोपाष्टमी पूजन विधि

गोपाष्टमी के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहने जाते है. उसके बाद गायों और उनके बछड़ों को नहलाकर उन्हें फूलों की मालाओं, हल्दी-चंदन और रोली से सजाया जाता है. फिर उनके माथे पर तिलक लगाकर, उनके गलों में घंटी और पुष्पहार पहनाए जाते हैं.

इसके बाद दीपक और अगरबत्ती जलाकर गौमाता की आरती की जाती है. दूध, गुड़, हरी घास और मिठाइयों से गौपूजन किया जाता है. पूजा के दौरान ‘गायत्री मंत्र’, ‘गोपाल सहस्र नाम’ या ‘गोमाता स्तुति’ का पाठ करना चाहिए. पूजा के बाद भक्त गौमाता की परिक्रमा कर उनके चरणों में प्रणाम करें. 

वृंदावन में गोपाष्टमी की धूम

मथुरा और वृंदावन में इस त्योहार को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. श्रद्धालु सुबह जल्दी उठकर गौशालाओं में जाकर पूजा कर, आरती गाते हैं और जय गोमाता के नारे भी लगाते हैं. इसके बाद मंदिरों में भक्त द्वारा भगवान श्रीकृष्ण और राधा को गोपाल स्वरूप में सजाया जाता है.

गायों के साथ परिक्रमा की जाती है और कई स्थानों पर गौदान की परंपरा भी निभाई जाती है.

जीवन में गोपाष्टमी का अर्थ

गौमाता की सेवा करना केवल श्रद्धा या धार्मिक कर्म नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक साधना है, जो हमें विनम्रता, प्रेम और आत्मिक शांति का संदेश देती है. इस दिन गायों को तिलक लगाना, उनका आशीर्वाद लेना और गोसेवा करना ना केवल पुण्य का कार्य है, बल्कि यह हमें हमारी जड़ों से जोड़ना भी सिखाती है.

यह पर्व हमें याद दिलाता है कि गाय केवल संपत्ति नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और आस्था का अमर प्रतीक भी है.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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