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भुवनेश्वर में रुकुणा रथ यात्रा आस्था का अद्भुत संगम! जानें इस 'पाप बिनाशी यात्रा' का रहस्य और महत्व

4 months ago

भुवनेश्वर के हृदय में स्थित लिंगराज मंदिर हर साल एक ऐसे भव्य उत्सव का साक्षी बनता है, जो आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक ऊर्जा का अद्भुत संगम है. यह है ‘रुकुणा रथ यात्रा’, जिसे देखने के लिए लाखों श्रद्धालु दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं.

यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ओडिशा की जीवंत विरासत और गहरी आस्था का प्रतीक भी है.

क्या है रुकुणा रथ यात्रा का महत्व?

अशोकाष्टमी के पावन अवसर पर आयोजित होने वाली यह यात्रा ओडिशा के प्रमुख त्योहारों में से एक मानी जाती है. इस दिन भगवान लिंगराज, जिन्हें एकाम्र क्षेत्र का संरक्षक देवता माना जाता है, भव्य रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं.

ढोल-नगाड़ों की गूंज, लोक संगीत की मधुर धुनें और “हरि बोल” व “हुलहुली” के जयकारे पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं. श्रद्धालुओं का मानना है कि इस रथ यात्रा के दौरान भगवान के दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है, इसलिए इसे ‘पाप बिनाशी यात्रा’ भी कहा जाता है.

यात्रा का भव्य आयोजन और रूट

इस वर्ष रुकुणा रथ यात्रा सुबह लगभग 10:45 बजे लिंगराज मंदिर से शुरू होकर रामेश्वर मंदिर तक जाएगी. इस शोभायात्रा में भगवान लिंगराज के साथ देवी रुक्मिणी (शक्ति स्वरूपा) और भगवान वासुदेव भी विराजमान होते हैं.

‘पट्टुओं’ (सेवायतों) के नेतृत्व में हजारों भक्त इस विशाल रथ को खींचते हैं. पूरे मार्ग में लोक नृत्य, पारंपरिक वाद्य और धार्मिक उत्साह देखने लायक होता है. प्रशासन द्वारा भीड़ को ध्यान में रखते हुए विशेष सुरक्षा और व्यवस्थाएं की जाती हैं.

पौराणिक कथा और इतिहास

रुकुणा रथ यात्रा से जुड़ी कई प्राचीन मान्यताएं हैं, जिनका उल्लेख एकाम्र पुराण में मिलता है.

  • राम कथा से संबंध:
    मान्यता है कि भगवान राम ने रावण वध के बाद ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए इस क्षेत्र में भगवान शिव की पूजा की थी. भगवान शिव के निर्देश पर राम ने यहां चार लिंग स्थापित किए रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर, भरतेश्वर और शत्रुघ्नेश्वर. अशोक अष्टमी के दिन रामेश्वर मंदिर की स्थापना हुई, और तभी से इस यात्रा की शुरुआत मानी जाती है.
  • त्रिपुरासुर वध की कथा:
    एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध ‘रुकुना’ नामक रथ पर सवार होकर किया था. इसी विजय की स्मृति में यह रथ यात्रा निकाली जाती है, जिसमें देवी शक्ति (रुक्मिणी) उनके साथ होती हैं.

रीतियां और परंपराएं

रुकुणा रथ यात्रा अपनी अनूठी परंपराओं के लिए जानी जाती है:

  • रथ पर भगवान लिंगराज के साथ माँ भुवनेश्वरी विराजमान होती हैं
  • रथ के सारथी स्वयं ब्रह्मा माने जाते हैं
  • हजारों श्रद्धालु मिलकर रथ को खींचते हैं
  • रथ रामेश्वर मंदिर के पास रुकता है, जहां चार दिनों तक विशेष पूजा-अनुष्ठान होते हैं
  • पांचवें दिन भगवान उसी रथ से वापस लिंगराज मंदिर लौटते हैं

इस पूरे आयोजन में आस्था, अनुशासन और परंपरा का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है.

रुकुणा रथ यात्रा सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि ओडिशा की आध्यात्मिक विरासत का जीवंत प्रतीक है. यह त्योहार न केवल भक्तों को भगवान के करीब लाता है, बल्कि समाज को एकजुट करने और सांस्कृतिक मूल्यों को जीवित रखने का भी कार्य करता है.

अगर आप कभी भुवनेश्वर जाएं, तो इस भव्य उत्सव का अनुभव जरूर करें यह केवल देखा नहीं, बल्कि महसूस किया जाता है.

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