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9 हजार का खर्च अब सिर्फ 91 रुपये! सैंपल ले जा रहा ड्रोन और दवा भी करेगा डिलीवर

2 days ago

भारत के ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना हमेशा से बड़ी चुनौती रही है. खासतौर पर टीबी जैसी गंभीर बीमारी के मामले में, जहां सही समय पर जांच और इलाज ही जान बचा सकता है. इसी मुश्किल को हल करने के लिए तेलंगाना में बेहद शानदार और आधुनिक शुरुआत हुई है.

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने तेलंगाना के यादाद्री भुवनगिरी जिले में टीबी की जांच को आसान, तेज और सस्ता बनाने के लिए ड्रोन सेवा की शुरुआत की है. यह पहल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) बीबीनगर के सहयोग से की गई. आइए समझते हैं कि यह तकनीक कैसे आम आदमी की जिंदगी बदल रही है?

9451 रुपये का खर्च सिर्फ 91 रुपये हुआ

गौरतलब है कि गांवों में रहने वाले मरीजों को अपनी टीबी की जांच कराने के लिए पहले शहर के बड़े अस्पतालों या जांच केंद्रों तक जाना पड़ता था. इसमें उनका पूरा दिन बर्बाद होता था. यात्रा में पैसे खर्च होते थे और कई बार दिहाड़ी भी छूट जाती थी.

आंकड़ों के मुताबिक, पहले एक मरीज को जांच के लिए औसतन ₹9451 खर्च करने पड़ते थे, लेकिन अब ड्रोन सेवा शुरू होने से यह खर्च घटकर महज 91 रुपये रह गया है. मरीज अब अपने घर के पास वाले छोटे स्वास्थ्य केंद्र में ही बलगम का सैंपल दे देते हैं और वहां से ड्रोन इन सैंपल्स को हवा के रास्ते बड़े जांच केंद्रों तक पहुंचा देता है. इससे मरीजों के पैसे और मेहनत दोनों बच रहे हैं.

15 दिन का काम अब 5 दिन में

टीबी के इलाज में सबसे जरूरी होता है कि बीमारी का पता जल्दी चले. पहले दूर के गांवों से सैंपल लैब तक पहुंचने और फिर उसकी रिपोर्ट वापस गांव तक आने में 15 दिन तक का समय लग जाता था. इतने लंबे इंतजार में मरीज की हालत और खराब होने का डर रहता था. 

ड्रोन तकनीक ने इस समय को सीधे 15 दिन से घटाकर सिर्फ 5 दिन कर दिया है. ताजा रिपोर्ट बताती है कि 76 प्रतिशत से ज्यादा मरीजों को उनकी जांच के नतीजे अगले ही दिन मिल रहे हैं. रिपोर्ट जल्दी आने का सीधा मतलब है कि मरीज का इलाज जल्दी शुरू हो पाता है, जो उसकी जान बचाने के लिए सबसे अहम है.

कैसे काम करता है यह सिस्टम?

इस योजना को योजनाबद्ध तरीके से लागू किया गया है. AIIMS बीबीनगर में मेन कंट्रोल सेंटर बनाया गया है, जो जिले के 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और 60 छोटे उपकेंद्रों से सीधा जुड़ा हुआ है. ड्रोन इसी नेटवर्क के बीच उड़ान भरते हैं, जिसे मेडिकल भाषा में हब एंड स्पोक मॉडल कहा जाता है. इसके तहत छोटे-छोटे केंद्रों से सैंपल इकट्ठे किए जाते हैं और उन्हें मुख्य लैब तक तेजी से पहुंचाया जाता है.

दवाइयां भी ला रहा ड्रोन

यह ड्रोन सेवा सिर्फ सैंपल भेजने तक सीमित नहीं है. जब मुख्य केंद्र में मरीज की रिपोर्ट पॉजिटिव आती है और डॉक्टरों दवा लिखते हैं तो वही ड्रोन वापसी की उड़ान में दूरदराज के गांवों तक टीबी की जरूरी दवाइयां भी पहुंचाता है. इसका मतलब यह है कि मरीज को दवा लेने के लिए भी शहर भागने की जरूरत नहीं है. आसमान से उड़कर दवा उनके गांव के स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच जाती है.

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