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मेजर शैतान सिंह भाटी की वीरता पर फिल्म:फरहान अख्तर बोले- ‘120 बहादुर’ देशभक्ति, जज्बे और सैनिक हौसले को सलाम करती है

7 months ago

फरहान अख्तर की फिल्म ‘120 बहादुर’ 1962 के भारत-चीन युद्ध में रेजांग ला की लड़ाई की वास्तविक कहानी पर आधारित है। यह फिल्म 13वीं कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी के 120 बहादुर भारतीय सैनिकों के बलिदान और साहस को दर्शाती है, जिन्होंने चीनी सेना की भारी टुकड़ियों का बहादुरी से सामना किया था। इस फिल्म का निर्माण रितेश सिधवानी और फरहान अख्तर के एक्सेल एंटरटेनमेंट बैनर तले किया है। इस फिल्म में फरहान ने मेजर शैतान सिंह भाटी का किरदार निभाया है। हाल ही में फरहान ने इस फिल्म को लेकर दैनिक भास्कर से खास बातचीत की। पेश है कुछ खास अंश.. सवाल: इस फिल्म को बनाने की प्रेरणा आपको कहां से मिली? जवाब: इस विषय पर फिल्म बनाने की प्रेरणा हमारे फिल्म के डायरेक्टर रजनीश ‘रैजी’ घई को बचपन से मिली थी। उनके पिता और भाई दोनों ही आर्मी में थे, इसलिए वो बचपन से ‘बैटल ऑफ रेजांग ला’ की कहानी सुनते आए हैं। उस जंग में मेजर शैतान सिंह भाटी और बाकी वीर अहीर जवानों की बहादुरी की बातें हमेशा उनसे जुड़ी रहीं। उन्होंने सोचा था कि जब कभी फिल्म बनाएंगे, तो इसी कहानी पर बनाएंगे। जब उन्होंने तय किया कि अब वक्त आ गया है, तो वो मेरे पास आए और बोले कि मैं चाहता हूं आप ये किरदार निभाएं। बस, यही से इस फिल्म की शुरुआत हुई। सवाल: फिल्म का नाम ‘120 बहादुर ‘ ही क्यों रखा गया? जवाब: बात यह है कि 17 नवंबर 1962 की रात जो हुआ, उसके बाद 18 नवंबर की सुबह तक जो भी हुआ, वो एक आदमी का अकेला काम नहीं था। एक आदमी था जो बहुत बढ़िया नेता था, बहादुर और डर के आगे नहीं झुकने वाला। उसने अपने सैनिकों में जोश और हौसला बढ़ाया, लेकिन लड़ाई में 120 सैनिक थे। इसलिए हमें लगा कि फिल्म का सही नाम होना चाहिए ‘120 बहादुर,’ क्योंकि ये फिल्म पूरी कंपनी के बारे में है। जब भी सेना लड़ाई में जाती है, तो हर सैनिक का योगदान ऑफिसर के जितना ही जरूरी होता है। इसी वजह से फिल्म का नाम ऐसा रखा गया। सवाल: मेजर शैतान सिंह भाटी का किरदार निभाने के बाद आपके व्यक्तिगत जीवन में क्या बदलाव आया? जवाब: इंसान के अंदर वो सारी ताकत होती है, जिससे अगर वह तय कर ले कि कौन-सी बात सही है और उसके लिए खड़ा होना जरूरी है, तो वह ऐसा कर सकता है। देशभक्ति जैसी बातें हमें प्रेरणा देती हैं। सरहद या देश की रक्षा हमारी अपनी जिंदगी से भी बढ़कर होती है। अगर कोई इस काम में अपनी जान भी दे दे, तो भी उसका किया काम आने वाली पीढ़ियों के लिए अच्छा होगा। इससे सीख मिलती है कि भले ही हम वर्दी (फौजी कपड़े) न पहनें, लेकिन जो भी काम करें, ईमानदारी से करें। जैसे सेना दुश्मनों को देश में घुसने नहीं देती, वैसे ही हमें बुरे विचारों या गलत पत्रकारिता जैसे झूठी सुर्खियों या क्लिकबेट को अपने अंदर नहीं आने देना चाहिए। हमें अपने दिल और अपने काम को इन बुराइयों से आजाद रखना चाहिए। सवाल: जब आप कोई किरदार निभाते हैं, तो उसमें पूरी तरह डूब जाते हैं। क्या बताना चाहेंगे कि उस रोल को समझने और जीने के लिए आप किस तरह की तैयारी या रिसर्च करते हैं? जवाब: अगर मैं मेजर शैतान सिंह भाटी के किरदार के बारे में बात करूं तो इनके बारे में किताबों में बहुत कुछ लिखा है। इंटरनेट पर भी बहुत जानकारी मिलती है, लेकिन उनकी कोई वीडियो नहीं है। सिर्फ तस्वीरें हैं। इसलिए मैं जितना पढ़ सका, उतना पढ़ा। जय समोता द्वारा लिखी किताब 'मेजर शैतान सिंह, पीवीसी: द मैन इन हाफ लाइट' एक बहुत अच्छी किताब है, जिसमें इनके बारे में लिखा गया है, वो मैंने पढ़ी। इसके अलावा, जब मैं उनके परिवार से मिला, तो उनके बेटे नरपत सिंह भाटी से जाना कि वे किस तरह के इंसान थे। लेकिन जब आप फिल्म सेट पर किसी किरदार को निभाते हैं, तो थोड़ी कल्पना और अपनी समझ का इस्तेमाल करना पड़ता है। किसी असली व्यक्ति की नकल नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसके सोचने और जीने के तरीके को अपने अभिनय में लाना चाहिए। सवाल: इस फिल्म में आपने कई नए कलाकारों को भी मौका दिया गया है, उनके बारे में बताएं। जवाब: हां जी, इस फिल्म की कास्ट बहुत ही अच्छी है। इसमें कई नए चेहरे हैं। कुछ की यह पहली फिल्म है, और कुछ ने पहले टीवी या ओटीटी पर काम किया है। अब वो बड़े पर्दे पर आ रहे हैं। लेकिन जब आप फिल्म देखेंगे, तो लगेगा ही नहीं कि ये नए कलाकार हैं। सबने बहुत अच्छा काम किया है। कोई भी कलाकार कमजोर नहीं लगा, सबका प्रदर्शन मजबूत है। इसका पूरा श्रेय हमारे डायरेक्टर और कास्टिंग डायरेक्टर को जाता है, जिन्होंने बहुत सोच-समझकर हर कलाकार को चुना है। सवाल: लद्दाख में शूटिंग करना काफी मुश्किल होता है। आप पहले भी वहां शूटिंग कर चुके हैं। इस बार शूटिंग के दौरान जगह, माहौल या वातावरण को लेकर क्या-क्या चुनौतियां आईं? जवाब: लद्दाख बहुत खूबसूरत जगह है, छुट्टियों के लिए तो बेहतरीन है, लेकिन काम करना वहां थोड़ा मुश्किल होता है। क्योंकि वहां ऑक्सीजन कम है और मौसम बहुत ठंडा या कभी-कभी बहुत एक्सट्रीम हो जाता है। पहली बार वहां ‘लक्ष्य’ की शूटिंग के लिए गया था। उसके बाद ‘भाग मिल्खा भाग’ के लिए गया। अब ‘120 बहादुर’ के लिए गया। लेकिन हर बार जब मैं वहां जाता हूं, तो अपने काम को एक मिशन की तरह लेता हूं। इसलिए मुझे वहां की मुश्किलें कभी परेशान नहीं करतीं। लद्दाख की खूबसूरती और शांति मुझे बहुत अच्छा एहसास देती है। ‘लक्ष्य ‘ की शूटिंग के समय मैं वहां करीब 5 महीने रहा था और अब इस फिल्म के लिए 2 महीने रहा। कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। उल्टा जब वहां से मुंबई लौटना पड़ा, तो थोड़ा दुख हुआ क्योंकि लद्दाख सच में बहुत सुंदर जगह है। सवाल: हर फिल्म कोई न कोई अच्छा संदेश देती है। इस फिल्म से युवा क्या सीखेंगे? जवाब: उम्मीद है कि युवा समझें कि हमारे पहले लोगों ने देश के लिए कितना बलिदान दिया। हर फिल्म या कहानी हमें याद दिलाए कि हमें अपने देश और खुद पर गर्व होना चाहिए। जरूरी नहीं कि हर कोई सरहद पर जाकर देश की सेवा करे, लेकिन जो भी काम करें, ईमानदारी और जिम्मेदारी से करें। अगर हर व्यक्ति अपना काम ईमानदारी से करेगा तो देश की पहचान और इज्जत दुनिया में बढ़ेगी। सवाल: भविष्य में आपके प्रोडक्शन के बैनर तले इस तरह की और फिल्में देखने को मिलेंगी ? जवाब: ये तो वक्त ही बताएगा। ऐसी कई घटनाएं हैं जिन पर फिल्म बन सकती है। लेकिन फिल्म मेकर की जिम्मेदारी होती है कि वह उस घटना को 2-3 घंटे में कैसे अच्छी और एंटरटेनिंग तरीके से पेश करे। कहानी बनाना एक चुनौती होती है। अगर कोई फिल्म आए जिसकी कहानी और स्क्रीनप्ले दोनों अच्छी हों, तो जरूर आएगी।
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