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'120 बहादुर' पूरे हिंदुस्तान की कहानी है:स्टारकास्ट बोली- कहानी सुन हमारे रोंगटे खड़े हो गए थे, हमारे लिए बहादुरी के मायने बदल गया

7 months ago

फिल्म 120 बहादुर के जरिए उस अनसुनी बहादुरी को बड़े पर्दे पर जिंदा किया जा रहा है, जिसे हमारे देश के इतिहास में वह सम्मान कभी नहीं मिला जिसका वह हकदार था। इसी फिल्म को लेकर हमारी खास बातचीत हुई कलाकार ब्रिजेश करनवाल, धनवीर सिंह, आशुतोष शुक्ला, अंकित सिवाच और दिग्विजय प्रताप से, जिन्होंने अपने-अपने किरदारों के जरिए 1962 के उन वीर सैनिकों की रूह और जज्बे को महसूस किया। बातचीत में इन सभी कलाकारों ने स्क्रिप्ट से जुड़ाव, कठोर ट्रेनिंग, ऊंचाई पर शूटिंग के अनुभव, फरहान अख्तर के साथ सफर और देश के प्रति अपनी भावनाओं को खुलकर बताया हैं। हमारे वीर योद्धाओं को आप सभी एक बार फिर से कहानी के जरिए पर्दे पर जिंदा कर रहे हैं। कैसे जुड़ाव हुआ आप सभी का 120 बहादुर की स्क्रिप्ट से? ब्रिजेश करनवाल- जब मैंने फिल्म 120 बहादुर की स्क्रिप्ट पढ़ी तो मेरे अंदर देशभक्ति की भावना पैदा हुई। मैं शुक्रगुजार हूं कि मैं उस कहानी का हिस्सा बनने जा रहा हूं, जो हमारे देश के इतिहास के पन्नों में दर्ज है। मेरा सौभाग्य है कि मुझे ऐसी फिल्म में काम करने का मौका मिला है। यह पल मेरे दिल-ओ-दिमाग में जिंदा रहेगा। आशुतोष शुक्ला- मुझे जब इस फिल्म की स्क्रिप्ट मिली तो मैं हैरान हो गया कि कैसे हमारे जवानों ने देश की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उन्हें मालूम था कि वे जिंदा नहीं बचेंगे, लेकिन फिर भी वो पीछे नहीं हटे। दिग्विजय प्रताप- मैंने कहानी सुनी तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। जहां 120 बहादुर जवान थे, उनके सामने हजारों लोग युद्ध के लिए खड़े थे, और यह कहानी ज्यादातर लोगों को पता भी नहीं है कि ऐसा कुछ हुआ था। फिल्म एक ऐसी फीलिंग देगी जिसे आप जिंदगी भर भूल नहीं सकते। अंकित सिवाच- मेरे लिए तो बहादुरी के मायने भी फिल्म देखने के बाद पूरी तरह से बदल गए थे। हम छोटी-छोटी चीजों को बहादुरी समझते थे, लेकिन इस फिल्म में एक फौजी का रोल करके पता चला कि आखिर असली बहादुरी होती क्या है। धनवीर सिंह- बिल्कुल ऐसी फिलिंग थी कि किस मिट्टी के बने हैं ये लोग, मतलब कहां से आया ये जज्बा इनके अंदर। हमें तो कांटा चुभ जाए तो तकलीफ हो जाती है, जिन पहाड़ों में हमने शूट किया वहां इतनी धूल-मिट्टी थी कि हमारे चेहरे काले पड़ गए थे, ऐसे कि मेकअप की भी जरूरत नहीं थी। उससे ज्यादा ऊंचाई पर जहां तापमान -30 डिग्री तक चला जाता था, वहां हमारे सैनिक डटे रहे। आप अपने रोल के लिए कितनी फिजिकल मेहनत की? क्योंकि एक फौजी की ट्रेनिंग करना कोई आसान बात नहीं। ब्रिजेश करनवाल- ट्रेनिंग बड़ी जटिल थी हम सबके लिए। मैंने पंजाब-हरियाणा में कुश्ती लड़ी है, मैं पहलवान हूं, तो पुराना रियाज मैंने फिर से दोहराया। फिल्म की ट्रेनिंग के लिए हमारे लिए विदेश से एक एक्शन मास्टर बुलाए गए, जिन्होंने हमें काफी कुछ सिखाया। हमें एक फौजी की ही तरह शॉर्ट-टर्म ट्रेनिंग से गुजरना पड़ा, जो एक सैनिक के लिए जरूरी होती है। 17 हजार फीट की ऊंचाई, सर्द हवा, बिना किसी सुख-सुविधा के 1962 की लड़ाई हमारे जांबाजों ने लड़ी। जब आप सब उनका रोल प्ले कर रहे थे तो क्या उस दर्द और गर्व को महसूस कर पाए? आशुतोष शुक्ला- हम जब शूट कर रहे थे तो उस ऊंचाई पर हमारे लिए काफी तरह की सहूलियत थी। प्रोडक्शन टीम ने सभी का ध्यान रखा हुआ था, हर तरह की सुविधाएं हमें दी गई थीं कपड़े, जूते, सारे साधन हमारे पास थे। लेकिन उस दौर को याद करें तो हमारे जवानों के पास ऐसा कुछ नहीं था। प्लास्टिक को काटकर वो खुद को माइनस तापमान में जैसे-तैसे ठंड से बचाते। सोचिए, कैसी बहादुरी और कैसा जज्बा रहा होगा उनके अंदर। ब्रिजेश करनवाल- यह फिल्म हमारे भारत माता की कहानी है, पूरे हिंदुस्तान की कहानी है। इसे पूरे परिवार के साथ देखने जाना चाहिए। यह कहानी उन वीर योद्धाओं की है, जो भारत माता की मिट्टी के लिए सरहद पर लड़े थे। यह कहानी आपको समझाएगी कि जब एक फौजी भारत की मिट्टी को तिलक की तरह अपने माथे पर लगाता है, तो उसके असली मायने क्या होते हैं। आप में से कुछ लोग न्यू-कमर हैं तो किसी ने OTT और फिल्मों में भी काम किया हुआ है। आपके लिए फरहान अख्तर के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? ब्रिजेश करनवाल- मैं उनके लिए कहूंगा कि फरहान अख्तर बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं डायरेक्टर, राइटर, सिंगर, एक्टर वो क्या नहीं हैं! जो एक चीज उन्हें सबसे अलग बनाती है वह है इंसानियत। इतना मल्टी-टैलेंटेड होने के बावजूद भी उस व्यक्ति में श्रद्धा-भाव है, जो उन्हें विरासत में मिला है। एक शेर है कितने कमजोर होते हैं कुछ गुब्बारे,जो बस सांसों से ही फूल जाते हैं।जो कमीने उरूज पाते हैं,वो औकात अपनी भूल जाते हैं। सल्यूट है फरहान सर को, उनके पांव जमीन पर हैं। आशुतोष शुक्ला- फरहान सर का जब शूट भी नहीं होता था, तब भी वो हमारे साथ बैठते थे और क्यूज देते थे। उन्होंने हमें कभी महसूस ही नहीं होने दिया कि हम इतने काबिल आदमी के साथ काम कर रहे हैं। बहुत आसानी से अप्रोचेबल थे हम सबके लिए। चीन घुसपैठ करने और कभी हमारे देश के कुछ इलाकों को अपना बताने की नाकाम कोशिश करता है। क्या इस फिल्म से आप उसके मंसूबों को जवाब देना चाहेंगे? ब्रिजेश करनवाल- यह कहानी जोश और जुनून की फिल्म है। यह भारत माता के सिंदूर की कहानी है हमारा गुरूर है। अगर अब कोई भी हिमाकत हमारे देश पर आंख उठाने की भी करे, तो वो समझ जाए कि अब उस बॉर्डर पर 140 करोड़ लोग खड़े मिलेंगे। तो अब सपने में भी न सोचे कि वो भारत माता के ताज को हमसे छीन पाएगा। सवाल ही नहीं उठता।
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