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एक रसोई में बनता है गुजरात के इस गांव का खाना, जानें इससे कैसे खत्म हो रहा अकेलापन?

2 months ago

Gujarat Unique Community Living Kitchen : गुजरात में एक ऐसा गांव है जहां लोग अपने-अपने घरों में खाना नहीं बनाते हैं. न सुबह की भागदौड़, न गैस सिलेंडर की चिंता, न रसोई का झंझट. इसके बजाय पूरा खाना एक ही जगह, एक शेयर रसोई में बनता है और फिर सभी लोग एक साथ सामुदायिक हॉल में बैठकर उसे खाते हैं. यह किसी फिल्म या कहानी की कल्पना नहीं है, बल्कि असल जिंदगी में गुजरात के छोटे से गांव चांदनकी (Chandanki) में ऐसा हो रहा है. यहां लोग सिर्फ खाना ही नहीं खाते, बल्कि एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं, बातें करते हैं, हंसते हैं और अपने दिल की बात भी शेयर करते हैं. 

कैसे शुरू हुआ यह किचन?

इस अनोखी व्यवस्था की शुरुआत एक बड़ी समस्या से हुई थी. गांव के कई युवा काम के लिए शहरों में चले गए. इसके कारण गांव में ज्यादातर बुजुर्ग अकेले रह गए. धीरे-धीरे उनका अकेलापन बढ़ने लगा और जीवन थोड़ा मुश्किल और सुना महसूस होने लगा.  इसी समस्या को समझते हुए गांव के सरपंच पूनम भाई पटेल ने एक नया और अलग विचार दिया. पूनम भाई पहले करीब 20 साल तक न्यूयॉर्क में रह चुके थे. वहां के जीवन और सुविधाओं को देखकर उन्होंने सोचा कि क्यों न गांव में भी एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जहां लोग अकेले न रहें.उन्होंने सुझाव दिया कि पूरे गांव के लिए एक ही रसोई और एक ही खाने का हॉल बनाया जाए, जहां सभी लोग साथ बैठकर खाना खाएं. 

एक रसोई, एक हॉल और पूरा गांव एक साथ

आज चांदनकी गांव में एक केंद्रीय रसोई है जहां रोज पारंपरिक गुजराती खाना बनता है, यहां खाना घर जैसा ही हेल्दी और टेस्टी होता है.  लोग हर महीने लगभग 2000 का योगदान देते हैं और इसके बदले उन्हें रोज दो समय का खाना मिलता है. रसोई में काम करने वाले रसोइयों को लगभग 11,000 की सैलरी दी जाती है, जिससे यह व्यवस्था टिकाऊ भी बन जाती है.

कैसे यह यूनिक कम्युनिटी लिविंग खत्म कर रही है अकेलापन

जहां खाना बनता है और खाया जाता है, वह स्थान भी खास है. गांव का सामुदायिक हॉल पूरी तरह एयर कंडीशन्ड है और सोलर पैनल से चलता है. यह जगह सिर्फ खाने के लिए नहीं है, बल्कि बातचीत और रिश्तों को मजबूत करने की जगह बन गई है. यहां लोग साथ बैठकर खाना खाते हैं और अपने जीवन की बातें शेयर करते हैं. बुजुर्ग अपने पुराने अनुभव बताते हैं, महिलाएं परिवार की बातें करती हैं, दोस्त हंसी-मजाक करते हैं और कई लोग अपने अकेलेपन को भी खुलकर व्यक्त करते हैं. 

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शुरुआत में लोगों को थी दिक्कत

जब यह व्यवस्था शुरू की गई थी, तो कई लोग इसके खिलाफ थे. कुछ लोगों को लगता था कि इससे घर जैसा अपनापन खत्म हो जाएगा. कुछ लोग सोचते थे कि खाना बनाना छोड़ना सही नहीं होगा, लेकिन धीरे-धीरे जब लोगों ने इसका फायदा देखा, तो उनकी सोच बदल गई. अब बुजुर्गों को रोज खाना बनाने की चिंता नहीं रहती. उनके पास आराम करने और लोगों से मिलने का समय बढ़ गया है. इस सामुदायिक रसोई ने सिर्फ खाना ही नहीं दिया, बल्कि लोगों को एक-दूसरे से जोड़ दिया है.अब गांव में लोग साथ बैठते हैं, बातें करते हैं, एक-दूसरे की मदद करते हैं और एक परिवार की तरह रहते हैं. जहां पहले अकेलापन था, वहां अब अपनापन महसूस होता है. 

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