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Diabetes Treatment Cost: डायबिटीज की दवाओं पर कौन-सा देश सबसे ज्यादा पैसा करता है खर्च, किस पायदान पर भारत?

6 months ago

Which Country Spends Most On Diabetes: डायबिटीज मेलिटस एक क्रॉनिक मेटाबॉलिक बीमारी है और दुनिया की सबसे आम नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज में शामिल है. औसतन हर 10 में से 1 एडल्ट इससे प्रभावित है. डायबिटीज से जूझ रहे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे न सिर्फ स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है, बल्कि देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी प्रभावित हो रही हैं. एक नई स्टडी में डायबिटीज को लेकर कौन से देश कितना खर्च करते हैं, इसका आंकड़ा बताया गया है. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं.

क्या निकला रिसर्च में?

इस रिसर्च को IIASA और वियना यूनिवर्सिटी ऑफ इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस के एक्सपर्ट्स की टीम ने मिलकर किया है. स्टडी में 2020 से 2050 के बीच 204 देशों में डायबिटीज के आर्थिक असर का आकलन किया गया. नतीजे चौंकाने वाले हैं.

अगर परिवार के सदस्यों द्वारा दी जाने वाली इनफॉर्मल देखभाल को अलग रखा जाए, तो डायबिटीज की वैश्विक लागत करीब 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर बैठती है, जो दुनिया की सालाना GDP का लगभग 0.2 प्रतिशत है. लेकिन जब इनफॉर्मल देखभाल को भी शामिल किया गया, तो यह लागत बढ़कर करीब 152 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाती है, यानी दुनिया की GDP का लगभग 1.7 प्रतिशत. डायबिटीज जैसी बीमारियों के मामले में यह आंकड़ा बेहद अहम माना जा रहा है.

कौन से देश में कितना होता है खर्च?

रिपोर्ट के मुताबिक, कुल आर्थिक बोझ का 85 प्रतिशत से 90 प्रतिशत हिस्सा इनफॉर्मल देखभाल से जुड़ा है. इसकी वजह यह है कि डायबिटीज में मरीजों की संख्या, मौतों की संख्या से 30 से 50 गुना ज्यादा होती है. भले ही डायबिटीज कम आय वाले देशों में ज्यादा फैली हो, लेकिन सबसे ज्यादा आर्थिक खर्च अमेरिका उठाता है. इसके बाद भारत और चीन का नंबर आता है. अनुमान है कि भारत पर इसका कुल असर करीब 11.4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का है. अगर अमेरिका की बात करें, तो वहां डायबिटीज से जुड़ा खर्च 16.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है, जबकि चीन पर यह बोझ करीब 11 ट्रिलियन डॉलर आंका गया है.

अमीर देशों पर ज्यादा बोझ

रिसर्च में यह भी सामने आया कि हाई-इनकम और लो-इनकम देशों के बीच एक बड़ा फर्क इलाज की लागत और काम करने की क्षमता में कमी से जुड़े नुकसान के बंटवारे में है. अमीर देशों में इलाज की लागत कुल आर्थिक बोझ का करीब 41 प्रतिशत है, जबकि गरीब देशों में यह सिर्फ 14 प्रतिशत तक सीमित है. स्टडी के को-राइटर और IIASA में इकोनॉमिक फ्रंटियर्स रिसर्च ग्रुप के कार्यवाहक प्रमुख माइकल कुहन का कहना है कि यह स्थिति साफ तौर पर दिखाती है कि डायबिटीज जैसी क्रॉनिक बीमारियों के लिए बेहतर और आधुनिक इलाज की सुविधा मुख्य रूप से हाई-इनकम देशों तक ही सीमित है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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