वेटरन एक्टर धर्मेंद्र का 89 साल की उम्र निधन हो गया। 24 नवंबर को एक्टर ने अपने घर पर आखिरी सांस ली। उनकी आखिरी रिलीज फिल्म साल 2024 में आई फिल्म ‘तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया’ थी। इस फिल्म के डायरेक्टर अमित जोशी ने धर्मेंद्र को लेकर अपनी यादें शेयर की हैं। उन्होंने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहा- ‘87 की उम्र में भी रात 2 बजे तक काम करते थे धरम जी, हर सीन उर्दू में खुद लिखकर प्रिपेयर करते थे। कड़ाके की ठंड में भी वैनिटी की अतिरिक्त सुविधा नहीं मांगते थे, कैमरा ऑन होते ही उनकी एनर्जी हम जवां लोगों से भी ऊपर पहुंच जाती थी। धरम सर... वह सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि वह भारतीय सिनेमा का एक युग थे। मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे अपनी फिल्म 'तेरी बातों में उलझा जिया' में उनके साथ काम करने का मौका मिला। और आज, यह बात कहते हुए गला रुंध जाता है कि वह उनकी आखिरी रिलीज्ड फिल्म थी। मैं उनका बहुत बड़ा फैन रहा हूं। लगातार कई दशकों तक लीड हीरो रहना, और आज तक उनके चेहरे पर जो तेज और जो एक्टिंग है- वह भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े नामों में से एक हैं। उनके निधन की खबर सुनकर अजीब लग रहा है, क्योंकि मैंने उनके साथ पूरी फिल्म की शूटिंग में बहुत समय बिताया है।' एकमात्र विकल्प-धरम जी जब मैंने और आराधना ने फिल्म में दादाजी का रोल लिखा, तो दिमाग में सिर्फ एक ही बात थी कि धरम जी से बेहतर यह रोल कौन करेगा? हम दोनों ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों, जैसे 'चुपके चुपके' और उनकी पंजाबी फैमिली ड्रामा वाली फिल्मों के फैन रहे हैं। उस रोल में जो ह्यूमर और जो गरिमा चाहिए थी, वह सिर्फ उन्हीं में थी। हमारी कल्पना में उनके अलावा कोई और था ही नहीं। यह हमारी खुशकिस्मती थी कि उन्होंने कहानी सुनी और तुरंत हां कर दी। मेरे ऑल टाइम फेवरेट हीरो के साथ काम करने का यह मेरा सपना था। अभिनय के प्रति समर्पण नैरेशन के वक्त पहली बार मैंने उनकी एक्टिंग के प्रति उत्साह देखा। उस उम्र में भी किसी भी चीज को करने की उनकी इच्छाशक्ति और उसे किस तरह से करना चाहिए, इसकी तैयारी अद्भुत थी। हम सेट पर बहुत रीडिंग करते थे, और वह इतने प्रिपेयर्ड एक्टर थे कि हर सीन को वह खुद लिखते थे। मेरी फिल्म में, वह शूटिंग से पहले पूरा सीन उर्दू में दोबारा लिखते थे। वह अपने डायलॉग्स को आत्मसात करने का उनका तरीका था। सेट पर जादू धरम सर के साथ एक खास बात थी, जो सिर्फ महान अभिनेताओं में होती है। वह कैमरे के सामने बहुत अलग थे। कैमरे से पहले वह थोड़े शांत रहते थे, लेकिन जैसे ही कैमरा ऑन होता था, उनके अंदर एक अलग ही एनर्जी आ जाती थी। ऐसा लगता था, जैसे वह बिल्कुल जवान हो गए हों। हम सब, यहां तक कि क्रू भी, इस बात को लेकर थोड़े चिंतित रहते थे कि कहीं वह थक न जाएं, कहीं उन्हें संभलना न पड़े, लेकिन जैसे ही कैमरा ऑन होता था, वह कुछ ऐसा करके दिखाते थे कि हम सब हैरान रह जाते थे। उनकी तैयारी लाजवाब थी। मुझे एक सीन याद है, जब शाहिद घर से भाग रहे होते हैं। हमने उन्हें सामान्य तरीके से बैठा रखा था। उन्होंने कहा, "नहीं यार, मुझे कंबल चाहिए, मैं कंबल ओढ़कर बैठता हूं।" उन्होंने अपने हिसाब से कैरेक्टर को कल्पना करके उसे एक ऐसे स्तर पर पहुंचा दिया, जो हमने लिखा था, उससे भी कहीं बेहतर था। मैं उनकी आखिरी फिल्म के बारे में बात कर रहा हूं, और उनकी एनर्जी उस उम्र में भी जवान एक्टर्स से भी ज्यादा थी। एक ग्रेट एक्टर की जो आभा होती है, वह उनमें थी। धरम जी से बड़ा कोई एक्टर है ही नहीं। जैसलमेर में बगैर वैनिटी के शूट एक बहुत अच्छी बात जो मुझे याद है, वह जैसलमेर की शूटिंग से जुड़ी है। हम रात को शूटिंग कर रहे थे। वैनिटी वैन किले के नीचे बहुत दूर थीं। रात का शूट था, और किसी को भी वैनिटी वैन से पैदल ऊपर तक आना बहुत मुश्किल था। मैंने उन्हें ऑफर भी किया कि मैं आपको कार से ले जाता हूं, या आप वापस वैनिटी वैन में चले जाइए। उन्होंने कहा- "नहीं, मैं यहीं पर कम्फर्टेबल हूं। आप ज्यादा से ज्यादा मेरे लिए आग लगवा दीजिए।" वह वहीं सेट पर बैठे रहे, रात को 2-2:30 बजे, जबकि शूट लेट हो रहा था। उन्होंने कहा, "मैं वापस जाऊंगा, तो आपका टाइम खराब होगा।" वह अपने साइड का इंतजार करते रहे। हमने उनके लिए आग जलवाई। उन्होंने पूछा, "क्या खाएंगे?" मैंने कहा, "मैगी।" फिर हमने मैगी खाई। वह डेडिकेशन... वह ग्राउंडेड होना... इतना कुछ हासिल करने के बाद भी इतना जमीन से जुड़ा रहना, यह एक बहुत बड़ी बात है। हम जैसे लोग तो उनसे सीखते हैं कि कैसे छोटी-छोटी बातों पर ईगो न रखकर काम करना चाहिए। दादाजी और पोते की केमिस्ट्री शाहिद कपूर (जो फिल्म में उनके पोते बने थे) भी धरम जी के साथ काम करने के लिए सुपर एक्साइटेड थे, क्योंकि उन्होंने कभी उनके साथ काम नहीं किया था। वह दुआ कर रहे थे कि धरम जी हाँ कह दें। इससे पहले उन्होंने ‘ जब वी मेट ’ में दारा सिंह जैसे लीजेंड्री संग काम किया था। सेट पर उनकी और शाहिद की केमिस्ट्री शानदार थी। जब आप फैमिली फिल्म शूट कर रहे होते हैं, तो पूरी फैमिली एक साथ रहती है। हम सब 50-60 दिन तक एक साथ थे, खाते-पीते थे। उनकी उपस्थिति ने पूरी यूनिट को एक वास्तविक परिवार जैसा महसूस कराया। धरम सर ने अपनी आखिरी फिल्म में जो प्यार, जो गरिमा, और जो अभिनय का जादू दिया, वह हमेशा मेरी यादों में, और सिनेमा में, जिंदा रहेगा। समर्पण जो रात के 2 बजे भी बरकरार रहा उनकी सहजता और अनुशासन के कई किस्से हैं, लेकिन जैसलमेर की शूटिंग का एक वाकया मैं कभी नहीं भूल सकता। हम रात को दो-ढाई बजे शूटिंग कर रहे थे। वैनिटी वैन किले से बहुत दूर, खाई में नीचे थीं। वहाँ बहुत कड़कड़ाती ठंड थी। रात के उस पहर में अगर वह चाहते तो अपनी वैन में आराम कर सकते थे, क्योंकि शॉट में थोड़ा वक्त था। लेकिन वह वहीं सेट पर बैठे रहे। मैंने उन्हें स्वेटर या वैनिटी में जाने के लिए ऑफर किया, क्योंकि इतने सीनियर एक्टर का इतनी ठंड में रुकना सही नहीं था। उन्होंने साफ मना कर दिया। "नहीं, मैं यहीं पर कम्फर्टेबल हूं। अगर मैं वापस जाऊंगा, तो आपका टाइम खराब होगा।" सोचिए, रात के 2 बजे, 87 साल की उम्र में, वह ठंड में इसलिए बैठे रहे ताकि हमारे शूट का समय खराब न हो। वह क्लाइमेक्स सीक्वेंस था। हमने उनके लिए आग जलवाई। उस माहौल में हमने साथ में मैगी खाई। वह डेडिकेशन और ग्राउंडेड रहना, यह सिखाता है कि महान कलाकार इतने महान क्यों होते हैं। छोटे-छोटे लोग छोटी-छोटी बातों पर ईगो में रहते हैं, पर धरम जी इतना अचीव करने के बाद भी सबसे ज्यादा जमीन से जुड़े थे। हर शॉट खुद करते थे सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि वह बॉडी डबल नहीं लेते थे। फिल्म के अंत में जो क्लाइमेक्स सीक्वेंस है, जहां रोबोट खराब हो जाती है और कृति को पकड़ा जाता है, वहां एक छोटा-मोटा एक्शन भी है। उन्होंने वह खुद किया। आखिरी सीन, जहां आंख जलने के बाद वह कृति का हाथ पकड़कर पूछते हैं कि "तुम आग क्यों लगा रही हो?"—वह उन्होंने अपनी पूरी एनर्जी के साथ किया। वह अपनी हर फिल्म में एक्टिंग से एक अलग ही स्तर पर जाते थे। 'तेरी बातों में उलझा जिया' में भी उनकी कॉमिक टाइमिंग और हर एक्टिंग बीट लाजवाब थी। डबिंग में भी और बेहतर करने की चाह हम तो अभी शुरुआत कर रहे हैं, पर उनसे सीखने को बहुत मिलता है। उनकी आखिरी फ़िल्म थी, और वह उसमें भी और मेहनत करना चाहते थे। फिल्म रिलीज होने के बाद उनका मुझे फोन आया था। उन्होंने बधाई दी, और सबसे बड़ी बात यह कही- "यार, मुझे और थोड़ी वर्कशॉप करनी चाहिए थी। मैं इसे और बेटर कर सकता था।" मैंने कहा, "आप क्या बात कर रहे हैं?" 87 साल की उम्र में, इतना कुछ हासिल करने के बाद भी, वह कह रहे थे कि मुझे और वर्कशॉप करनी चाहिए थी! डबिंग के समय भी, जबकि फिल्म सिंह साउंड पर थी (मतलब आवाज आ ही रही थी), मैंने उन्हें एक बार सुनाया। उन्हें लगा, "नहीं यार, इसको मैं और बेटर कर सकता हूं।" और उन्होंने डबिंग की। वह सिर्फ इसलिए, क्योंकि उनको लगा कि वह उस सीन को और बेहतर कर सकते हैं। यही एक महान कलाकार की निशानी होती है। फैमिली और अनुशासन उनके आने का समय भी गजब का था। मैं यंग हूं, और यह मेरी पहली फिल्म थी। मैं डरते-डरते पूछता था कि सर कितने बजे आएंगे? हम अगर उन्हें 8 बजे का कॉल टाइम देते थे, यह जानते हुए कि मैं रोल (शॉट शुरू) 9 बजे करूंगा, वह 7 बजे या 6:30 बजे ही सेट पर आ जाते थे। वह पूरा अनुशासन के साथ काम करते थे। शाहिद और उनके बीच भी केमिस्ट्री बहुत अच्छी थी। फैमिली फिल्म होने की वजह से हम सब साथ में हंसी-मजाक करते थे। धरम जी की वजह से पूरी यूनिट एक परिवार की तरह बन गई थी। मैं आज खुद को बहुत खुशकिस्मत मानता हूं कि मुझे उनकी आखिरी फिल्म को डायरेक्ट करने का मौका मिला। यह भगवान का दिया हुआ आशीर्वाद है। मैं उन्हें हमेशा उसी उत्साह, उसी समर्पण और उसी विशाल व्यक्तित्व के साथ याद रखूंगा। धरम सर को मेरी तरफ से गहरा नमन।