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धुरंधर फिल्म के कारवां-गाने वाले सिंगर बोले-स्ट्रगल कुछ नहीं होता:यह बेवकूफ बात है; ट्रेलर के बाद में मेरा नाम लोग ढूंढ़ने लगे थे

5 months ago

धुरंधर फिल्म का ‘कारवां’ गाना बीकानेर के सिंगर शहजाद अली ने गाया है। ट्रेलर में गाने की कुछ लाइनों ने ही श्रोताओं को दीवाना बना दिया था। रिलीज से पहले ही यह गीत चर्चा में बना रहा था। गाने को लेकर सिंगर का कहना है कि इस गाने ने मेरे जीवन में बहुत सारे बदलाव लाए हैं। ट्रेलर के बाद मेरा नाम लोग ढूंढ़ने लगे थे। स्ट्रगल कुछ नहीं होता, यह बेवकूफ बात है। भगवान-अल्लाह मौका देता है कि इस वक्त में आप सीखो और इसके बाद आपको कामयाबी मिलेगी। शहजाद अली ने दैनिक भास्कर के साथ खुलकर बात की है। सवाल: धुरंधर फिल्म ने किस तरह आपका जीवन बदला, इसके बारे में बताएं? शहजाद अली: जब धुरंधर फिल्म में कारवां गाना रिलीज हुआ, तब मैं बीकानेर में था। ट्रेलर में यह गाना आया था। मुझे किसी ने वॉट्सऐप पर यह गाना भेजा, और कुछ ही घंटों बाद लोग इसे भेजते रहे और दुआ देते रहे। ट्रेलर से ही देशभर के लोगों ने इसे पसंद किया, जब तक कि पूरा गाना आया नहीं था। ट्रेलर में 80 प्रतिशत कमेंट्स यह थे कि इस गाने को रिलीज करो, लोगों को यह गाना पूरा सुनना था। इसके बाद मुझे प्रतीत होने लगा कि अब कमाल होने वाला है और मैं मुम्बई चला गया। इस गाने ने मेरे जीवन में बहुत सारे बदलाव लाए। मैं शाश्वत सचदेव सर का शुक्रगुजार करना चाहता हूं, जो जयपुर से हैं और धुरंधर के म्यूजिक डायरेक्टर हैं। उन्होंने मुझ पर हमेशा भरोसा रखा है। इससे पहले उन्होंने मुझसे आर्टिकल 370, उलझ जैसी फिल्मों में गाने गवाए। इस दौरान हमने इंडियन ओडिसी नाम से एक एल्बम भी बनाया, यह इंटरनेशनल कॉलोब्रेशन था। उन्होंने हमेशा मुझे मोहब्बत के साथ गाने गवाए। सवाल: इस गाने की सरगम को लेकर खूब चर्चा है, कितना क्रेडिट शाश्वत को देंगे और इस गाने को बनाने के प्रोसेस के बारे में बताएं? शहजाद अली: इस गाने का पूरा क्रेडिट शाश्वत सर को ही जाता है। जो क्रिएटर होता है, उसकी कंपोजिशन औलाद के बराबर होती है। ऐसे में एक बाप अपनी औलाद किसी और को दे, यह बड़ा मुश्किल काम होता है। शाश्वत सर बहुत परफेक्शनिस्ट हैं। जब उन्होंने इसे क्रिएट किया और मुझे बुलाया, तब उन्होंने कहा- गाना आपको गाना है, लेकिन पता नहीं क्या गाना है। तब उन्होंने उसी वक्त गाना बनाया, उसी वक्त ट्रैक बनाया और उसी वक्त मैंने गाया। इस गाने की सरगम भी उन्होंने ही बनाई और मुझे सिखाई। हमने एक ही टेक में इसे तैयार किया। इसी गाने को आज पूरी दुनिया सुन रही है। सवाल: कारवां काफी पुराना गाना है, इसे रिक्रिएट किया गया है, ऐसे में कितना चैलेंज था इसको लेकर? शहजाद अली: लोगों को यह पता है कि यह पुराना गाना है, लेकिन मैं सभी को बताना चाहता हूं कि यह आजादी से भी पुराना गाना है। यह गाना फतेह अली खां और मुबारक अली खां साहब का है। 1940 में इसे क्रिएट किया गया था और दोनों कलाकारों ने पहली बार इसे देवआनंद साहब की पार्टी में गाया था। फतेह अली खां साहब नुसरत साहब के पिता थे, इसे उन्होंने क्लासिकल में कव्वाली बनाई थी। 1960 में रोशन साहब ने इसे रीक्रिएट किया और अब शाश्वत साहब ने इसे रीक्रिएट किया है। सवाल: सक्सेस तो आज लोग देख रहे हैं, स्ट्रगल किसी ने नहीं देखी, आठ साल से आप गा रहे हैं, किस तरह की स्ट्रगल रही? शहजाद अली: स्ट्रगल कुछ नहीं होता, बेवकूफ बात है यह। भगवान-अल्लाह मौका देता है कि इस वक्त में आप सीखो और इसके बाद आपको कामयाबी मिलेगी। इसे आप संभाल कर रखो। सवाल: बेटी को आप अपनी सक्सेस का क्रेडिट देते हैं, इसके बारे में बताएं? शहजाद अली: 17 नवम्बर को धुरंधर का ट्रेलर आया था और 16 नवम्बर को मेरी बेटी हुई थी। अल्लाह से मैंने बेटी की ही दुआ की थी। मैं चाहता था कि मेरे बेटी हो और यह बात मैंने अपनी वाइफ और परिवार को भी बताई थी। उसके जन्म के बाद ही यह ट्रेलर लॉन्च हुआ और पूरे हिन्दुस्तान को मेरा गाना पसंद आ गया था। शहजाद नाम के व्यक्ति को ढूंढ़ा जा रहा था। 25 नवम्बर को लोगों को पता लग गया कि यह गाना किसने गाया है। इसलिए कहता हूं कि बेटियां रहमत होती है और उसी का परिणाम है कि मुझे देशभर में प्यार मिल रहा है। मेरी यह मन्नत थी कि मेरे बेटी हो, क्योंकि उसके होने के बाद परेशानियां कम हो जाएगी और वही हुआ। सवाल: यह गाना बाद में रिलीज होना था, लेकिन ऑडियंस की डिमांड पर इसे पहले लाया गया, इसमें कितनी सच्चाई है? शहजाद: हम जो भी काम करते हैं वह ऑडियंस के लिए ही करते हैं। यह गाना ऑडियंस को समझ आ गया था, तो हमारा हक बनता था कि इसे पहले लाया जाए। हम अपने लिए नहीं जीते हैं, हम पब्लिक के लिए जीते हैं, मेरे ख्याल से आर्टिस्ट का दूसरा रूप यही होता है। सवाल: आप संगीत परिवार से आते हैं, इस परम्परा को आज भी निभाया जा रहा है? शहजाद अली: मेरा जो समाज है, वहां पर बहुत सारे लोग संगीत परम्परा को निभाते हैं। आज मेरे साथ सुलतान आए हुए हैं, इनके परिवार ने रिद्म को पूरी दुनिया में पहुंचाया है। गुलाम हुसैन, शकूर सुलैमानी जो मेरे उस्ताद रहे, रोशन अली जिन्होंने 1988 से लेकर 2007 तक जितनी भी फिल्में आई, उन्होंने वाद्ययंत्रों के जरिए रिद्म अरेंज की। मेरे उस्ताद अब्दुल सत्तार साहब और पुखराज शर्मा से मैंने तालीम ली। बीकानेर में म्यूजिक धरा बहुत पहले से है। कॉमर्शियल मार्केट में आना होता है और तब लोगों को पता लगता है कि इनके परिवार या समाज में ऐसे बड़े-बड़े फनकार भी रहे हैं। हमारे समाज के प्रत्येक घर में चार कलाकार को जरूर मिलेंगे। मेरे बड़े फादर रज्जब अली जो राजकुमार डागर के नाम से पहचान रखते थे। वे बेहद खास कलाकार थे। मेरे दादा नसीर अहमद साहब सारंगी प्लेयर थे। हमारे समाज में आज भी काफी लोग नेक्स्ट लेवल का म्यूजिक बनाते हैं
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