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Breast Cancer in Young Women: क्या लॉन्जरी पहनने से जल्दी होता है ब्रेस्ट कैंसर? नई-नई जवां हुईं लड़कियां भूलकर भी इग्नोर न करें डॉक्टरों की यह सलाह

7 months ago

Breast Cancer in Young Women: यंग महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. हालिया रिसर्च ने इसके पीछे कई कारणों की ओर इशारा किया है, जिनमें लिंजरी इंडस्ट्री की प्रैक्टिसेज और कल्चर भी शामिल हैं. आलोचना करने वालों का कहना है कि इन उत्पादों में इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स और ब्रांड्स की मार्केटिंग स्ट्रैटेजी कहीं न कहीं इस बीमारी के खतरे को बढ़ाते हैं और शुरुआती पहचान में देरी कर सकते हैं. हालांकि, अब कई बड़े ब्रांड्स कैंसर रिसर्च और प्रिवेंशन प्रोग्राम्स में निवेश करना शुरू कर चुके हैं. चलिए आपको बताते हैं कि इसके मामले क्यों तेजी से बढ़ रहे हैं.

बढ़ते केस और नई स्टडी

JAMA Network Open में 2024 में प्रकाशित एक स्टडी में बताया गया कि पिछले दो दशकों में 20 से 49 साल की महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के मामले अमेरिका में लगातार बढ़े हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि यह बढ़ोतरी कई कारणों से जुड़ी है, जिसमें लाइफस्टाइल, रिप्रोडक्टिव पैटर्न्स, पर्यावरणीय प्रभाव और हेल्थ सर्विलांस सब शामिल हैं.

ब्रॉ हाइपोथेसिस और कसावदार डिजाइन

लिंजरी इंडस्ट्री को लेकर सबसे बड़ी बहस “ब्रॉ हाइपोथेसिस” पर है. 2014 की Journal of Cancer Prevention स्टडी में कहा गया कि टाइट और लंबे समय तक ब्रा पहनने से लसीका फ्लो प्रभावित हो सकता है, जिससे ब्रेस्ट में दिक्कत और कैंसर के खतरे का जोखिम बढ़ सकता है. हालांकि अभी तक ठोस कारण-सबूत नहीं मिले हैं, लेकिन कसावदार डिजाइन वाली लिंजरी को लेकर बहस लगातार जारी है.

केमिकल्स का खतरा

लिंजरी बनाने में इस्तेमाल होने वाले फैब्रिक्स में कई बार एंडोक्राइन डिसरप्टिंग केमिकल्स पाए जाते हैं. Environmental Health Perspectives (2017) और Journal of Toxicology and Environmental Health (2020) में छपे अध्ययनों ने ऐसे केमिकल्स जैसे फ्थेलेट्स, फॉर्मल्डिहाइड और सिंथेटिक डाई की मौजूदगी को दर्शाया है. ये लंबे समय तक हार्मोनल असंतुलन और ब्रेस्ट कैंसर के खतरे से जुड़े माने जाते हैं. एक्सपर्ट बताते हैं कि साल 2012 से 2021 तक हर साल लगभग 1 प्रतिशत की दर से युवतियों में ब्रेस्ट कैंसर के मामले बढ़े हैं. मोटापा, देरी से मां बनना, सेडेंट्री लाइफस्टाइल इसके प्रमुख कारण हैं. लेकिन कपड़ों और लिंजरी जैसे रोजमर्रा के प्रोडक्ट्स में मौजूद केमिकल्स की भूमिका भी नजरअंदाज़ नहीं की जा सकती.

स्किन कॉन्टैक्ट और लंबे समय तक असर

एक्सपर्ट बताते हैं कि सिंथेटिक कपड़ों में मौजूद फ्थेलेट्स, BPA और PFAS जैसे फॉरएवर केमिकल्स स्किन के जरिए शरीर में जा सकते हैं. ये पॉलिएस्टर, नायलॉन और स्पैन्डेक्स जैसे फैब्रिक्स में पाए जाते हैं, जो लिंजरी में आमतौर पर इस्तेमाल होते हैं. डॉक्टर्स का कहना है कि प्राकृतिक फाइबर चुनना और ब्रांड्स से ट्रांसपेरेंसी की मांग करना एक्सपोजर घटाने में मदद कर सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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