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Artificial Vision Technology: अंधेपन के मरीजों को मिला नया तोहफा, अब फिर से देख पाएंगे सपनों की दुनिया

7 months ago

Blindness Cure Technology: कभी-कभी विज्ञान और टेक्नोलॉजी का मिलन ऐसा चमत्कार कर देता है, जो अब तक हमें सिर्फ साइंस फिक्शन फिल्मों में ही देखने को मिलता था. लंदन के Moorfields Eye Hospital और यूरोप के कुछ अन्य मेडिकल सेंटर्स के वैज्ञानिकों ने एक बेहद छोटा फोटोवोल्टाइक माइक्रोचिप बनाया है, जिसे रेटिना के नीचे इम्प्लांट किया जा सकता है. यह चिप आकार में सिर्फ चावल के दाने जितना है, लेकिन इसकी ताकत इतनी है कि इससे कानूनी तौर पर अंधे मरीजों ने फिर से पढ़ना, चेहरों को पहचानना और रोजमर्रा के काम करना शुरू कर दिया है.

इस क्रांतिकारी तकनीक का नाम है प्राइमा सिस्टम. इसे 38 मरीजों पर इंटरनेशनल ट्रायल के तहत लगाया गया, जिसमें पांच यूरोपीय देशों की टीमें शामिल थीं. यह चिप खास चश्मे के साथ काम करता है, जिनमें लगे कैमरे आंखों तक इंफ्रारेड इमेज भेजते हैं. चिप उन इमेज को इलेक्ट्रिकल सिग्नल में बदलकर ऑप्टिक नर्व के ज़रिए दिमाग तक पहुंचाता है. इस तरह मरीज फिर से अक्षर, शब्द और आकृतियों को पहचानने लगते हैं.

इन लोगों पर हुआ ट्रायल

70 वर्षीय शीला इरविन, जिनकी सेंटर दिखने की क्षमता 30 साल पहले चली गई थी, उन्होंने इस चिप के बाद पहली बार बिना गलती किए आई चार्ट पर अक्षर पढ़े. BBC के साथ बातचीत में शीला ने कहा, "मुझे ऐसा लग रहा है कि मानो मेरी पूरी जिंदगी बदल गई है." शुरुआत में मरीजों को इन इमेज को समझने के लिए ट्रेनिंग दिया जाता है, ताकि दिमाग नए विजुअल इनपुट को प्रोसेस करना सीख सके.

हर अंधेपन का इलाज नहीं

हालांकि यह तकनीक हर तरह के अंधेपन का इलाज नहीं है. यह मुख्य रूप से एडवांस्ड ड्राई एज-रिलेटेड मैक्युलर डिजेनरेशन वाले मरीजों पर काम करती है, जो अब तक लाइलाज बीमारी मानी जाती थी. New England Journal of Medicine में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, 84 प्रतिशत मरीजों ने चिप लगने के बाद पढ़ने की क्षमता हासिल की और उनकी देखने की क्षमता पांच लाइन तक बेहतर हुई.

लंदन के आई रोग एक्सपर्ट और इस सर्जरी के प्रमुख सर्जन डॉ. माही मुकीत ने कहा कि "यह पहला ऐसा इम्प्लांट है जिसने मरीजों को ऐसा विजन दिया, जिसे वे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल कर पा रहे हैं." यह तकनीक आने वाले समय में दुनियाभर के करोड़ों AMD मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण बन सकती है. हालांकि यह अभी सिर्फ क्लिनिकल ट्रायल में उपलब्ध है, लेकिन उम्मीद है कि जल्द ही NHS जैसे हेल्थ सिस्टम्स के जरिए आम मरीजों तक भी पहुंच सकेगा.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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